छोड़ कर कंचन महल अटारी
छोड़ के कंचन महल अटारी,
जोगन रूप मनाऊंगी......
वृन्दावन की कुन्ज गली में,
अपनी कुटी बनाऊंगी.....
लट चिपकाऊ,भस्म रमाऊंगी,
लोकलाज बिसराऊंगी......
मन में तेरी मोहनी सुरत,
ले करताल बजाऊंगी........
सास-ससुर की कही ना मानूं,
घुंघट मुख ना छिपाऊंगी......
लोग कहे मीरा भई बावरी,
लोक लाज बिसराऊंगी........
—लक्ष्मी सिंह
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