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दास्तां सुना जाना

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मैं रात अंधियारी चंद्र प्रकाश बन आ जाना। मेरे मन के आँगन में स्नेह दीप जला जाना। शीतल,निर्मल,स्निग्ध चाँदनी सी अति सुन्दरतम्, मंत्र मुग्ध करे कुछ ऐसी दास्तां सुना जाना। —लक्ष्मी सिंह 

दोहरी जिन्दगी

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सच-झूठ का मुखौटा पहन खुद से अनजान। दोहरी जिन्दगी जीने लगा है आज का इन्सान।। युग नई, सोच नई,पुराने का हो रहा अवसान। अपनी ही बनाई जाल में खुद फस रहा नादान।। जख्मों से भरा सीना चेहरे पर झूठी मुस्कान। कशमकश से भरी दोहरी जिन्दगी से परेशान।। मन में रहे कुछ मुख से कुछ करता बखान। दिखावे की चलन में खुद से बेखबर अनजान।। गिरगिट सा रंग बदलता पल पल ये महान। आयना भी देख कर खुद हो रहा है हैरान।। मुख में राम बगल में छुरी झूठ की चादर तान। दोहरी जिन्दगी जीते-जीते कभी थकता नहीं शैतान।। आज तो इन्सान को ही खुद खा रहा इन्सान। एक चेहरे पे कई चेहरे ओढ़ बन गया भगवान।। हर एक मोड़ पर खड़ा है एक बहुरूपिया हैवान। जानवर से भी ज्यादा खतरनाक बन गया इन्सान।। योग्यता,सद्गुणों से आदमी की अब कहाँ पहचान। ढ़ोग,आडंबर,दिखावे को नित मिल रहा सम्मान।। तिरस्कृत, आहत, अपमानित, उपेक्षित हर गुणवान। आज शिक्षा का व्यापार हो रहा, गुरू का अपमान।। नित नये-नये स्वांग से करे साध्य सब अासान। आज धर्म,ईमान सिर्फ़ पैसा,स्वार्थ हुआ बलवान।। सजावट,दिखावट, मिलावट...

तुलसी महिमा

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तुलसी भारत देश में, पूजनीय कहलाय। युग-युग से तुलसी यहाँ, देवी मानी जाय।। 1 तुलसी हिंदू धर्म में, जग जननी कहलाय। आँगन की शोभा बनी, घर-घर पूजी जाय।। 2 तुलसी का नभ है पिता, धरती मात कहाय। शालिग्राम भगवान ने, उनसे ब्याह रचाय। 3 एक पौधा तुलसी का, आँगन बीच लगाय। अपनी वास सुवास से, घर-आँगन महकाय।। 4 बिन तुलसी के पात के, प्रभु को भोग न भाय। राम भक्त हनुमान तो, भूखे ही रह जाय।। 5 तुलसी बन संजीवनी, हर दुख दर्द भगाय। सुख, शांति व स्नेह, धारा, जड़ में रखे छुपाय।। 6 तुलसी एक औषधि है, तन को रखे निरोग। बीज, तना, जड़, पत्तियाँ, सब आये उपयोग।। 7 अर्ध्य श्रद्धा व नेह का, हर चोट का उपाय। तुलसी रंगत में दिखे, मुझको मेरी माय।। 8 तुलसी में हर शाम को, दीपक रखें जलाय। देवी कृपा बनी रहे, सुख संपति घर आय।। 9 तुलसी घर-आँगन बसे, एक वैद्य समान। सस्ती, सहज, उपयोगी, ये गुणकारी खान।। 10 शिव को शंख गणेश को, तुलसी नहीं चढ़ाय। ऐसा जो कोई करे, घर अमंगल बुलाय।। 11 जन्म से मौत तक हमें, तुलसी आती काम। वृंदा देवी को सदा , नित उठ करें प्रणा...

प्रकृति

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प्रकृति जो मधुर गीत गाती हैं वो सबको कहाँ सुनाई देती है झरनों की तरंग में, इन हरे भरे वादियों में जाने कितने ही रंग समाई होती है। सुन सको तो सुन लो, चुन सको तो चुन लो, फिर ये मनोरम दृश्य शहरो में कहाँ पाई जाती है।                                                 - लक्ष्मी सिंह

मेरा कान्हा

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(1) ललना निहारने मातु यशोदा, अहो भाग्य मैंने पायो कान्हा। देख-देख छबि मन नहीं भरता, सबसे अनोखा है मेरा ललना। (2)  लेती बलैया मुख कभी चुमे। माँ की गोद में ललना झूले, जब से गृह कान्हा जी आये, मातु यशोदा खुशी से फूले। (3) नाच रहा है छोटा-सा कन्हैया। संग- संग नाच रही है दुनिया। देवी देवता सब पुष्प लुटाये, ऋषि-मुनि मंगल गाये बधैया। (4) ठुमक चलत नंद लाल बाजत पैजनिया, माथे शोभे मोर मुकुट हाथ में बांसुरिया। हर्षित सब ग्वाल बाल बृज की गोपियां, मात यशोदा अति आनंद पायो कन्हैया। —लक्ष्मी सिंह