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ख़ुशी

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💓 💓 💓 💓 दर्द भरी इस जीवन से,  खुशियों का हर क्षण चुराती हूँ.....  मैं लम्हा-लम्हा जीती हूँ,  खुशियों का अमृत पीती हूँ....  —लक्ष्मी सिंह  💓 ☺

माँ (लघु कथा)

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🌹 🌹 🌹 🌹 ॐ नमःशिवाय 🌹 🌹 🌹 🌹 लघु कथा , आज दुर्गा बहुत परेशान है।रात के दो बज रहे है।धरती -आकाश सब सो चूके है।पर,उसके आँखों में नींद कहाँ,गला दर्द से रूँध गया था।सीने के दर्द से छाती फटा जा रहा था।दिल कर रहा है अभी चिल्लाकर रो दे।पर बगल मे पाँच साल की नन्हीं परी जो सो रही है ।वह जाग जाएगी।वह रो भी नहीं सकती है। वह गहन सोच में पड़ी है कि अब दुर्गा क्या करे? उसे पता चल चुका है कि उसके गर्भ में जो नन्हीं जान पल रही है वह  बेटी है।घरवालों के दबाब में आकर पति के साथ पता कराने चली तो गई पर अब लड़की है। क्या करे? शाम को मैके भी फोनकर के पूछी सभी ने कहा खराब कर दे...एक बेटी है,ही दूसरा बेटा होगा तब रखना।बेटी है ,मत रख ।ससुरालवाले का तो समझ में आता है जो कह रहे हैं। दुर्गा को मैके वालों से ऐसी उम्मीद ना थी।ससुराल वाले ना सही कम से कम वो तो साथ देते..।रात इसी ओह -पोह में गुजर गई...।सबेरे उठी पति ने कहा तैयार रहना ।मैं आज आॅफिस से जल्दी आऊगा ...डा0 के पास चलना है..।उसने कोई जबाब ना दी ...।बेटी को स्कूल पहुचा आई।स्नानकर माँ के आगे जोत जलाकर पूजा करने बैठ गई। वैसे दुर्गा नितकार्य नि...

मैं हिमवान मैना की बेटी,

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💓 💓 💓 💓 मैं हिमवान मैना की बेटी,  मैं जग जननी भवानी।  कन्या रूप में जन्म लिया, और बढकर हुई मैं सयानी।  मेरे तन मन में,  बसे हैं औढरदानी।  वो जगत पिता,  तीनों लोकों के स्वामी।  जनम-जनम से,  रट ये मेरी।  नहीं मिलेगें शिवशंकर,  तो हम रहें कुवारी।  —लक्ष्मी सिंह  💓 ☺

विस्तार

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💓 💓 💓 💓 विस्तार ही सुख की आवश्यक शर्त है। जो खुद में सिमट गया उसका जीवन गर्त है।  —लक्ष्मी सिंह  💓 ☺

दिल की पतंग

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💓 💓 💓 💓 💓 💓 दिल की पतंग को,  रिश्तों की डोर में बाँध लो...  चाहत की उड़ान को,  हृदय का वृहत आकाश दो...  रिश्तों की डोर को,  मुलाकात की चरखी पे लपेट लो..  बातों की नरमी में,  गुड़ की मिठास दो...  मन की अहम को,  दिल से निकाल फेक दो...  खुली हुई बाहों से अपनेपन का एहसास दो...  जो भी दूर हो,  उन सब को आवाज दो..  हर मकरसक्रांती पर अपनों का साथ हो...  रिश्तों में मिठास,  अपनेपन की बात हो....  —लक्ष्मी सिंह 💓 ☺

मकरसंक्राति

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💓 💓 💓 💓 💓 💓 भारतीय कृषक परम्परा का बोध पर्व है मकरसंक्राति।  धरती-गगन से लेकर सम्पूर्ण जनमानस के कल्याण की। प्रकृति, कृषि, ऋतु परिवर्तन का त्योहार।  ये तीनों चीजें ही हैं जीवन का आधार। इस पर्व में होती है सूर्यदेव की आराधना।  ये है भौतिक-अभौतिक तत्वों की आत्मा। यह पर्व क्रियाशीलता और उत्पादन का प्रतीक।  खरमास की समाप्ति और पुण्य काल घोषित। पूरे देश में होती है मकरसंक्राति की धूम।  मकरसंक्राति के अनेक नाम, विविध रूप। पंजाब में माघी, उत्तर में खिचड़ी।  गुजरात और राजस्थान में उत्तरायणी। तरह-तरह के परम्परा और संस्कृति।  विविध प्रक्रिया व पौराणिक कथाओं की रीति। कहीं आसमान रंग-बिरंगे पतंगों से घिरा।  कहीं गुड़ तिल से बनी मिठाईयों से मूँह मीठा। कहीं बनती खीर, कहीं चटपटी खिचड़ी।  कहीं खाते चुड़ादही के संग गुड़ की पट्टी। भांति-भांति रीति रिवाजों द्वारा भक्ति।  खाते-पीते और करते ढेर सारी मस्ती। संक्रांति पर देवताओं को दिया जाता है हव्य।  और अपने सभी पितरों ...