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नन्हा बचपन

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                                          मानस पटल पर आज, फिर  नन्हा बचपन छा गया।               धुंधला - सा , हर बात याद आ गया।  वो राखी पर , आपस में लड़ना।  पहले मुझे ,पहले मुझे , ऐसा कह , कलाई का आगे बढ़ाना।  सबसे सुन्दर उपहार  देने की आपस में , प्रतियोगिता करना।  तीन भाई की , एक अकेली बहना।  कितने सुहाने दिन थे , उन दिनों का क्या कहना।  बड़े भाई  की , छत्रछाया में आगे बढ़ना , और छोटों से लड़ करना।  थोड़ा लड़ना झगड़ना , रूठना, मनना , हर बात पर चिढाना , एक दूसरे के लिए  जान हथेली पर रखना।  मानस पटेल पर आज , फिर नन्हा बचपन कहा गया।  धुंधला - सा , हर बात याद आ गया।                 -लक्ष्मी सिंह                -नई दिल्ली 

रक्षा बंधन

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अति सुन्दरतम् सावन ऋतु आई ।  संग रक्षा-बंधन का पर्व है लाई।  बहन बाजार से सुन्दर राखी लाई,                                      पूजा की थाली सजाई ।                                                               अपने भाई को आवाज लगाई, द्वार पर है नजरें बिछाएँ इस बार तो आजा मेरा भाई । अति सुन्दरतम् सावन ऋतु आई । संग में रक्षा बंधन का पर्व है लाई। नहीं चाहिए मुझे रूपया - पैसा, तुम्हें देखने को आँखें मेरा तरसा। नहीं चाहिए गहना - साड़ी, बस आजा मेरा प्यारा भाई । बहना ने आवाज लगाई । अति सुन्दरतम्  सावन ऋतु आई । संग में रक्षा - बंधन का पर्व है लाई । अपनी बहन के पास तो आजा, इस राखी का धर्म निभा जा । आँख से मोती झर - झर बरसे, तेरे मिलन को नैना तरसे । बहुत दिन हुए तुम से बिछड...

भैया

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दूर होकर भी पास, मुलायम दुब पर शबनमी एहसास हैं भैया ।, छलके मेरी आँखों से, यादों के झरोखों में, बसा संसार हैं भैया । सारी खुशियाँ जिसमें मिल गए, पंखुड़ी - पंखुड़ी सहेजे गए, सतत् व्यवहार हैं भैया । रूठे तो मुकर जाते हैं, जो टूटे तो बिखर जातें हैं, फूलों का ऐसा पराग हैं भैया । बेवजह रूठना, खुद ही मान जाना, कभी गुस्सा,  तो कभी प्यार हैं भैया । ये बंधन नेह से भरा, कच्चे धागे सूत का, राखी का त्योहार हैं भैया । मधुर,  पावन, निश्च्छल माँ के मन सा कोमल, पिता सा दुलार हैं भैया ।              - लक्ष्मी सिंह                नई दिल्ली 

ऋतु सावन

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                                             अति सुन्दरतम ऋतु  सावन की आई बहार ।  सूर्य से तपती धरती को था, जिसका इन्तजार । प्रतिपल परिवर्तित नूतन साज श्रृगार । नव किशलय का हरित विहार । सुन्दर, अलंकृत, सजीव मनोरम, प्रकृति को मिला सौन्दर्य उपहार । धानी चुनरिया पहने धरती, अंबर को मिला इन्द्रधनुष का सतरंगी हार । चहुँ ओर प्रकृति का अह्लाद, मस्त मगन हो नाच उठा सारा संसार । उमड़ - घुमड़ घन अम्बर छाये, शीतल -मंद बहे पूरवैया, ठंढी परत फुहार । हंस पुकारे, तीतर गाये, कोयल कूँके, करे पपीहा  पीऊ - पीऊ की पुकार । झिंगुर बोले, मेढक की टर्-टर, कीटफतिंगा, भवरों की मीठी  गुंजार । बादल गरजे, बिजली चमके, नभ से बरसत मुसलाधार । चाँद छुपता कभी निकलता, जुगनू रात में टिम-टिम करता, रह-रह बरसाता वह ऐसी रसधार । सावन आया संग में लाया, कितना सारे पर्व - त्योहार । जन्माष्टमी, श्रावणी खीर, हरिय...

ये कैसी देश की झाँकी है

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ये कैसी देश की झाँकी है, बदलाव अभी भी बाँकी है । कुछ करके दिखलानी है,  सम्पूर्ण आजादी लानी है ।                                                                                           पथभ्रष्ट हो गए हैं नेता, जो देश को लूट के है खाता । जो खुद दंगा फैलाता है, और बाद में मलहम लगता है । ये कैसी गंदी राजनीति है, जो देश का खून पीती है । ये कैसी देश की झाँकी है, बदलाव अभी भी बाँकी है । कुछ करके दिखलानी है, सम्पूर्ण आजादी लानी है । बिन माँ का बच्चा रोता है, माता - पिता बस बोझा है । औरत की अस्मत बिकती है, जहाँ इन्सान की कीमत सस्ती है । रिश्ता पैसों से बनती है । ये कैसी देश की झाँकी है, बदलाव अभी भी बाँकी है । कुछ करके दिखलानी है, सम्पूर्ण आजादी लानी है । गंगा मैली रोती है, हवा बहुत प्रदुषित है । फैली ...

नई सदी को मिल रही ये कैसी सौगात

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नयी सदी को मिल रही ये कैसा सौगात । भारत माता दर्द से कराह रही है आज । फैला धर्म - पाखंड का चारो ओर अंधकार । तनिक ठहर जा देश भक्त इस पर करो विचार । प्रेम समर्पण मिट गया फैला आतंक और अत्याचार । घर - घर में हो रहा है, देखो नर संहार । पथहीन, दिगभ्रमित  नेता और भ्रष्ट है सरकार । काले - धंधे, रिश्वतखोरी हैं इनके व्यपार । गंगा मैली हो गई, वायु में भरा विकार । गंदा खाना खा - खा कर लोग हो रहे हैं बीमार । फैल रहा है संगठित अपराधकर्ता, और अअवैध कारोबार । दर - दर भटक रहा है शिक्षित बेरोजगार । कहीं बाढ, भूकम्प तो, कहीं सूखे की मार । फांसी पर लटक रहा है किसान होकर लाचार । कहीं भूख रोटी की, बेघर, फटे कपड़े जार - जार । कहीं गोदामों में दबा कर रखा हुआ अनाज का भंडार ।। अपनों के आगे अपने ही हो रहें लाचार । दूर हो रहें हैं आज परिवार से परिवार । आज हर रिश्तों में पड़ रही दरार । वृद्धा आश्रम में रो रहे हैं माता - पिता बीमार  । ईर्ष्या, द्वेष, अन्याय और निर्दयता का व्यवहार । नई पीढ़ी को मिल रही ये कैसी शिक्षा और संस्कार । ...

मेरे सपनों का भारत

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मेरे सपनों के भारत का विश्व में पहला स्थान हो । दुनिया में अपने देश का एक अलग पहचान हो । राष्ट्रीयता एवं विश्व बन्धुत्व की भावना का निर्माण हो । देश , जाति , समाज , समुदाय आदि सभी का कल्याण हो । सुरक्षा एवं संरक्षा के लिए एकीकृत आपात कालीन सेवा प्रदान हो । आधुनिक समस्याओं का अतिशीघ्र निदान हो । भ्रष्टाचार , महँगाई , हिंसा , आतंक का न नामोनिशान हो । आँखों में शर्म , दिल में प्रेम , सुरक्षित सारा जहान हो । संगठित अपराध कर्ताओं एवं अवैध कारोबार पर लगाम हो । देश में हर किसी के पास अपना रोजगार एवं काम हो । नई चेतना , नई विचारों , नित्य नूतन प्रयोग का विहान हो । नया भूगोल , नया संसार और नया इन्सान हो । गरीबी , लाचारी , बेरोजगारी से ना कोई परेशान हो । एक नया दिन निकले , हर प्राणी के मन का उत्थान हो । हर जगह शौचालय , अस्पताल एवं शिक्षण संस्थान हो । ज्ञानी जनों का व्यक्तित्व विकास में योगदान हो । अब ना गरीबी से आत्महत्या करता किसान हो । हरियाली से लहलहाता हर खेत -खलिहान हो । सूखा और बाढ़ से ये देश ना कभी परेशान...